Pratham Singh प्रशिक्षु in जीव विज्ञान
यकृत से आप क्या समझते हैं

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Deva yadav प्रशिक्षु

यकृत  

यकृत शरीर की सबसे बड़ी एवं व्यस्त ग्रंथि हैं जो कि हल्के पीले रंग पित्त रस का निर्माण करती हैं। यकृत को जिगर या कलेजा एवं अंग्रेजी में Liver कहते हैं जो मानव शरीर का एक अंग हैं यकृत केवल कशेरुकी प्राणियों में पाया जाता है। यह भोजन में ली गई वसा के अपघटन में पाचन क्रिया को उत्प्रेरक एवं तेज करने का कार्य करता हैं। इसका एकत्रीकरण पित्ताशय में होता हैं यकृत अतिरिक्त वसा को प्रोटीन में परिवर्तित करता हैं एवं अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में परिवर्तित करने का भी कार्य करता हैं। जो कि आवश्यकता पढ़ने पर शरीर को प्रदान किए जाते है। वसा के पाचन के समय उतपन्न अमोनिया (विषैला तरल पदार्थ) को यकृत यूरिया में परिवर्तित कर देता हैं। यकृत पुरानी एवं क्षति ग्रस्त लाल रक्त कणिकाओं को मार देता हैं। इसका कार्य विभिन्न चयापचयों को Detoxify करना, प्रोटीन को संश्लेषित करना और पाचन के लिए आवश्यक जैव रासायनिक बनाना है।

यकृत मनुष्य के शरीर में पाई जाने वाली सबसे बड़ी तथा महत्वपूर्ण पाचक ग्रंथि होती हैं जो पित्त का निर्माण करती हैं। पाचन के क्षेत्र में यकृत विशेष भूमिका निभाता हैं यह पाचन में अवशोषित आंत्ररस के उपापचय का मुख्य स्थान हैं। इसके निचले भाग में नाशपाती के आकार की थैली होती हैं जिसे पित्ताशय कहते हैं यकृत द्वारा स्त्रावित पित्त रस पित्ताशय में ही उपस्थित होते हैं। यह शरीर का सबसे बड़ा अंग और ग्रंथि है जो कि लाल भूरे रंग की होती है। यकृत उदरीय गुहा के ऊपरी दाई ओर एवं डायफ्राम के बिल्कुल नीचे स्थित होता है , यह दो पिण्डो दायाँ और बायाँ पिण्ड में विभाजित होता है। ये फेल्सीफॉर्म लिगामेंट्स द्वारा पृथक होते है। यकृत का दायां पिंड नीचे की तरफ वास्तविक दायें पिंड , क्वाड्रेट और कोडेट पिण्ड में विभेदित होता है।

                यकृत                                                                                       चित्र – यकृत

एक नाशपति आकार की थैलेनुमा पित्ताशय यकृत की पश्च सतह से संयोजी उत्तक द्वारा जुडी रहती है। दाई एवं बायीं हिपेटिक नलिका जुड़कर एक सामान्य हिपेटिक नलिका बनाती है। यह बाद में सिस्टिक नलिका से जुड़ जाती है जो पित्ताशय से उत्पन्न होती है। बाद में सिस्टिक नलिका और सामान्य हिपैटिक नलिका जुड़कर पित्त नलिका बनाती है। जो कि नीचे से गुजरती है और पश्च भाग में मुख्य अग्नाशय नलिका से जुड़कर hepatopancreatic ampulla (ampulla of vater) बनाती है।

यह ओपनिंग oddi के कपाट द्वारा रक्षित होती है। बॉयडेन की कपाट पित्त नलिका की ओपनिंग को अग्नाशय नलिका के साथ जुड़ने से पहले घेरे रखता है। यकृत पित्त का स्त्रावण करता है (यकृत पित्त pH 8.6 , पित्ताशय पित्त pH 7.6 ) पित्त पित्तवर्णकों और पित्त लवणों (सोडियम कार्बोनेट , सोडियम ग्लाइकोलेट , सोडियम टोरोकोलेट) , जल म्यूसिन और कोलेस्ट्रोल युक्त होता है। पित्त लवण वसा के पाचन और अवशोषण में सहायता करता है। पित्त में कोई एंजाइम नहीं होता।

जब ग्रहणी में भोजन उपस्थित होता है। पित्त ग्रहणी में बहने लगता है यदि ग्रहणी में भोजन उपस्थित नहीं होता तो पित्त सिस्टिक नलिका द्वारा पित्ताशय में चला जाता है। जहाँ यह संग्रहित होता है। चूहे और घोड़े में पित्ताशय नहीं होता।

पित्त – पित्त क्षारीय (pH – 7.7) होता है , इसकी स्त्रावित मात्रा 600 ml से एक लीटर है। इसमें जल -92% , पित्त वर्णक -0.3% , वसीय अम्ल = 0.3 से 1.2% , कोलेस्ट्रोल = 0.3 से 0.9% , लेसीथिन – 0.3% होता है।

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